अभ्यास का महत्व :-
किसी भी फील्ड में उन्नति के शिखर पर पहुंचने की चाहत रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति अभ्यास के महत्व से भलीभांति परिचित है | यह एक ऐसा हथियार है जो हमें युद्ध में विजय श्री तक ले जाता है इसके बगैर सारे हथियार अशक्त हैं | व्यक्तित्व का विकास भी इस दायरे के बाहर नहीं है
मैनें दुनिया में किसी भी फील्ड में सफल होने वाले महान व्यक्तियों में जो विशेषता सामान्य रूप से देखा, वह है अभ्यास का गुण | यही वह गुण है जो उन्हें आम से खास बनातें हैं और उनके सफलता की राह आसान कर देते हैं | तब यह ज़रूरी हो जाता है कि हम अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए बार-बार चीजों का अभ्यास करें |
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| अभ्यास का महत्व |
अभ्यास का अर्थ
अभ्यास का अर्थ है किसी भी कार्य में पारंगत या निपुण होने के लिए उस कार्य को बार-बार करना, जब तक कि वह हमारे व्यक्तित्व का सहज अंग न हो जाए | अभ्यास ही वह कुंजी है जो बंद पड़े भाग्य के ताले को खालने का कार्य करती है |
इसी तथ्य को विद्या अर्जन के सन्दर्भ में उपन्यासकार 'यशपाल' अपने प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यास 'दिव्या' में प्रतिपादित करते हुए कहते हैं कि 'अनाभ्यास विद्या का शत्रु है' | ये बात जीवन के हर क्षेत्र में लागू होती है |
सफलता के लिए हमें कई चरणों से होकर गुजरना पड़ता है यथा ज्ञान, बोध, विश्लेषण, समय प्रबंधन, अभ्यास, धैर्य आदि | लेकिन इसमें से सबसे अधिक प्रभावी अभ्यास की ताकत है | अभ्यास में वह शक्ति है जो किसी मूर्ख व्यक्ति को भी विद्वान बना सकती है स्वयं कबीर दास जी के शब्दों में ही इसका प्रमाण देख लीजिए..
करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान |रसरी आवत जात ते, सिल पर पड़ निशान ||
बार- बार के अभ्यास से मूर्ख व्यक्ति भी समझदार हो जाता है जिस प्रकार से रसरी के आने जाने से उस पत्थर पर भी निशान पड़ जाता है | इसके सबसे सशक्त उदाहरण कालीदास, गोस्वामी तुलसीदास, थॉमस एडीसन और आइंस्टीन हैं जिन्होंने अभ्यास के बल पर महानता की सीमा को प्राप्त किया |
अभ्यास की सिद्धि
अभ्यास के महत्व से परिचित होने के बाद हमारे लिए यह जानना जरूरी हो जाता है कि हम अभ्यास की सिद्धि कैसे करें अर्थात अभ्यास को अपने जीवन में कैसे उतारें ? आगे हम इसी प्रश्न का समाधान ढूढ़ने की कोशिश करेंगे |
अभ्यास को जीवन का अंग बनाने के हलिए सबसे पहले हमारे पास एक प्लेटफार्म होना चाहिए जिस पर अभ्यास को अंजाम दिया जा सके | और प्लेटफार्म तब होगा जब हमारे पास कोई सपना होगा जिसे प्राप्त करने के लिए हम कुशलता अर्जित करने का प्रयास करते हैं | इसी कुशलता को अर्जित करने के लिए हमें अभ्यास की आवश्यकता पड़ती है | जिस दिन हम अभ्यस्त हो जाएंगे उसी दिन से सफलता मिलने की शुरुआत हो जाएगी |
अभ्यास की सिद्धि में दूसरा सबसे बड़ा हथियार 'वैराग्य' होता है जो कि हमें अपने लक्ष्य के अतिरिक्त बाकी सभी चीजों से दूरी बनाये रखने में सहायता करता है | जिसकी वजह से हमारी सफलता के अवसर बढ़ जाते हैं | इसी तथ्य को श्री
कृष्ण ने गीता के छटे अध्याय के श्लोक संख्या 35 में मन को वश में करने के सन्दर्भ में इस प्रकार से व्याख्यायित किया है...
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् |
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ||
अर्थात
हे महाबाहो! नि:संदेह मन चञ्चल और कठिनता से वश में होने वाला है ; परन्तु हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! यह अभ्यास और वैराग्य से वश में होता है |
अत: आप जिस भी फील्ड में सफल होना चाहते हैं उस फील्ड से जुड़ी कुशलता का बार-बार अभ्यास कीजिए और वैराग्य का सहारा लेकर लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग में आ रहे बाधाओं से विमुख होइये |
यही सफलता का आधार है |
अंत में हम अपने विचारों को समेकित करते हुए कह सकते हैं कि हमें सफलता पाने के लिए हमारे पास मूलत: एक मंजिल होनी चाहिए तत्पश्चात उस फील्ड से जुड़ी जानकारी इक्ट्ठा करने पर मेहनत करनी चाहिए | उसके बाद अपने फील्ड में कुशलता अर्जित करने के लिए निरंतर मेहनत व अभ्यास करते रहना चाहिए और फिर वैराग्य को धारण कर अपने मन को वश में करें | इस प्रक्रिया के बाद आप पायेंगे कि आप सफलता के शीर्ष पायदान पर खड़े हैं |

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