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उद्देश्य

उद्देश्य   आप सभी का   Nvachar 'नवाचार'  ब्लॉग में स्वागत है | साथियों आप इस ब्लॉग पर आयें हैं तो संभवतः इसका यही मतलब है कि आप भारतीय संस्कृति और दर्शन से गहरे स्तर तक जुड़े हैं | आप भारतीय परंपरा, रीति-रिवाज, रहन-सहन और सबसे अहम भारतीयता को संपूर्णता से जानना व समझना चाहते हैं मगर आपको इस मामले में आधी-अधूरी जानकारी से ही संतोष करना पड़ता है | इसके कई कारण हो सकते हैं.. 1-  समयाभाव :-   तेजी से बदलते दुनिया में हर व्यक्ति के पास समय का कम होना कोई बड़ी बात नहीं है | हर इंसान अपनी रोजी रोटी की फिक्र में ही अपना सारा समय खफा देता है जिससे उसे अपनी संस्कृति,  सभ्यता व दर्शन के बारे में पढ़ने का समय ही नहीं मिल पाता है | 2- सही जानकारी का न मिल पाना :- आज इंटरनेट के दौर में कॉपी- पेस्ट करके बिना सच्चाई जाने खबरों को इधर-उधर बहुत से लोग फैलाते हैं | इससे पाठको को न तो पूरी जानकारी ही मिल पाती है और न ही सही | वह आधी-अधूरी जानकारी को ही पूरा सच मानकर आगे बढ़ता है | 3- किताबों का भारी-भरकम होना :-   आज तक भारतीय संस्कृति को व्याख्यायित करने वाले जितने ...

आश्रम व्यवस्था : भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग

 आश्रम व्यवस्था : भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग आश्रम व्यवस्था :-  जिस प्रकार वर्ण व्यवस्था भारतीय संस्कृति का प्रमुख अंग है उसी प्रकार आश्रम व्यवस्था भी भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग है | भारतीय मनीषियों के अनुसार मनुष्य जीवन के  चार महत्वपूर्ण उद्देश्य हैं -धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष |  धर्म से हमारा तात्पर्य इहलोक व परलोक सुधारने के लिए मनुष्य द्वारा किया गये नैतिक कर्म से है | अर्थ से तात्पर्य अपना जीवन-यापन के लिए या फिर जरूरतों को पूरा करने के लिए किए गए उद्यम से है | काम से तात्पर्य अपनी वंश परंपरा को चलाने के गृहस्थ जीवन को अपनाना है और  मोक्ष से तात्पर्य आत्मा के निरंतर चलने वाले इस अंतहीन चक्र से छुटकारा पाकर परम तत्व में विलीन हो जाना | आश्रम व्यवस्था आश्रम व्यवस्था की आवश्यकता :-  यह सब इतना आसान नहीं है जितना हम सब समझते हैं | इसके लिए निश्चित दिशा में कठोर श्रम की आवश्यकता थी | एक निश्चित दिशा या मार्गदर्शन देने के लिए आश्रम व्यवस्था अपनाया गया था | आश्रम व्यवस्था चार चरणों में विभाजित थी | और प्रत्येक चरण का ...

वर्णव्यवस्था : भारतीय संस्कृति का सामाजिक आधार

वर्णव्यवस्था : भारतीय संस्कृति का सामाजिक आधार जिस प्रकार किसी शासन व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए उसे कार्य के आधार पर कई विभागों में बांटा जाता है ठीक उसी प्रकार भारतीय संस्कृति में समाज को बेहतर रूप से चलाने के लिए समाज को कार्य के आधार पर जिस रूप में विभाजित किया गया उसी रूप को वर्ण व्यवस्था के नाम से जाना जाता है | वर्ण व्यवस्था भारतीय संस्कृति का सामाजिक आधार है   वर्णव्यवस्था : भारतीय संस्कृति का सामाजिक आधार वर्ण व्यवस्था का स्वरूप :- प्राचीन काल में वर्ण व्यवस्था का स्वरूप जन्म के आधार पर न होकर कार्य, योग्यता, श्रम तथा प्रवृति के आधार पर था | कार्य, श्रम, योग्यता और प्रवृत्ति के आधार पर समाज की जो व्यवस्था बनायी गयी थी वह चार प्रकार की है | 1~ ब्राह्मण 2~क्षत्रिय 3~ वैश्य 4~ सूद्र प्राचीन काल में वर्ण व्यवस्था :- अपनी योग्यता के अनुरूप मनुष्य जो भी काम करते थे, वही उनकी सामाजिक पहचान बन जाती थी और यही सामाजिक पहचान उनकी वर्ण व्यवस्था का आधार था | प्राचीन काल में एक ही परिवार के व्यक्ति अपनी योग्यता के अनुसार अलग अलग वर्ण के हो सकते थे ...

भारतीय संस्कृति की विशेषताएं

भारतीय संस्कृति की विशेषताएं :- भारतीय संस्कृति दुनिया की सबसे अनुपम व अद्वितीय संस्कृति है जिसकी बराबरी दुनिया की कोई भी संस्कृति नहीं कर सकती है | भारतीय संस्कृति अपने आप में अनूठे विशेषताओं का संगम है जो उसे अन्य संस्कृतियों से अलग बनाती है | हममें से बहुत से लोग हैं जो भारतीय संस्कृति के बारे में जानना तो चाहते लेकिन इंटरनेट पर आसान भाषा में भारतीय संस्कृति के बारे में मिलना मुश्किल है इसीलिए भारतीय संस्कृति को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से आसान भाषा में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहा हूँ  | मुझे विश्वास  है आप सभी इसे पसंद करेंगे | 1~ सबसे पुरानी :- भारतीय संस्कृति दुनिया की सबसे पुरानी संस्कृति है | मिश्र की संस्कृति संभवत: इसके आसपास की है पर आज मिश्र की संस्कृति सिर्फ नाममात्र की रह गयी है | इसके बाद बहुत सी संस्कृतियों ने जन्म लिया लेकिन वे समय के साथ कदम-ताल न कर पाने के कारण समाप्त हो गयीं |  आज के समय में भारतीय संस्कृति की तुलना सिर्फ और सिर्फ चीन से की जा सकती है और किसी से नहीं | 2~ अनवरत प्रवाहमान :-  भार...

विश्व का गौरव : भारतीय संस्कृति

विश्व का गौरव : भारतीय संस्कृति :- भारतीय संस्कृति सर्वव्यापक और निरंतर गतिशील संस्कृति है | जो अनादि काल से निरंतर प्रवाहमान है | यह सत्यं, शिवं व सुंदरम् की अवधारणा के साथ पल्लवित व फलित होती है | भारतीय संस्कृति के गौरव देश के सामने दुनिया की हर संस्कृति ने अपने घुटने टेक दिए | इसकी विशालता इतनी है कि पूरी उम्र लगाकर भी थाह पाना मुश्किल है और सहज इतना कि अनपढ़ व्यक्ति भी इसका कायल हो जाए | जो संस्कृति इतनी समृद्ध, व्यापक और विशाल है और जिसे सम्पूर्ण विश्व के मनीषियों ने न सिर्फ सहर्ष स्वीकारा है बल्कि मुक्त कंठ से प्रसंशा भी है उसके बारे में बेहतर और सटीक जानकारी होना आवश्यक है | यह सटीक जानकारी आपको इसी ब्लॉग पर मिलेगी | आइये जानते हैं संस्कृति की परिभाषा और भारतीय संस्कृति का स्वरूप क्या है? संस्कृति की परिभाषा :- संस्कृति का अर्थ होता है परिमार्जित करना या परिष्कृत करना | मनीषी गण इसकी व्याख्या परंपरा से चली आ रही रहन-सहन , आचार-विचार,  जीवन पद्धति व संस्कार के रूप में भी करते हैं | जो प्रत्येक देश की अलग-अलग होती है | किसी भी देश की संस्कृति में मुख्यतः सभ...