वर्णव्यवस्था : भारतीय संस्कृति का सामाजिक आधार
जिस प्रकार किसी शासन व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए उसे कार्य के आधार पर कई विभागों में बांटा जाता है ठीक उसी प्रकार भारतीय संस्कृति में समाज को बेहतर रूप से चलाने के लिए समाज को कार्य के आधार पर जिस रूप में विभाजित किया गया उसी रूप को वर्ण व्यवस्था के नाम से जाना जाता है | वर्ण व्यवस्था भारतीय संस्कृति का सामाजिक आधार है
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| वर्णव्यवस्था : भारतीय संस्कृति का सामाजिक आधार |
वर्ण व्यवस्था का स्वरूप :-
प्राचीन काल में वर्ण व्यवस्था का स्वरूप जन्म के आधार पर न होकर कार्य, योग्यता, श्रम तथा प्रवृति के आधार पर था | कार्य, श्रम, योग्यता और प्रवृत्ति के आधार पर समाज की जो व्यवस्था बनायी गयी थी वह चार प्रकार की है |1~ ब्राह्मण
2~क्षत्रिय
3~ वैश्य
4~ सूद्र
प्राचीन काल में वर्ण व्यवस्था :-
अपनी योग्यता के अनुरूप मनुष्य जो भी काम करते थे, वही उनकी सामाजिक पहचान बन जाती थी और यही सामाजिक पहचान उनकी वर्ण व्यवस्था का आधार था | प्राचीन काल में एक ही परिवार के व्यक्ति अपनी योग्यता के अनुसार अलग अलग वर्ण के हो सकते थे | इसे एक उदाहरण से समझते हैं
- एक व्यक्ति के चार लड़के थे | चारों अलग अलग बुद्धि के थे | बड़ा लड़का संस्कृत का प्रकाण्ड विद्वान था और वह ज्ञान अर्जन तथा विद्या दान में अधिक रुचि रखता था | इस तरह की प्रवृत्ति वाले लड़के को उस समय ब्राह्मण के नाम से बुलाया जाता था | समय के साथ ब्राह्मण उपाधि ही उसकी पहचान बन गई | जो ब्राह्मण वर्ण व्यवस्था का आधार है |
- दूसरा लड़का सैन्य कला, युद्ध कला और प्रशासन में रूचि रखने के कारण क्षत्रिय कहलाता था | राज्य को संचालित करने का दायित्व क्षत्रियों पर था | उत्साह, वीरता इनमें कूट-कूट कर भरी होती थी | क्षत्रियों का उसूल यही होता था कि जान चली जाए लेकिन सिर किसी के सामने झुकना नहीं चाहिए |
- तीसरा व्यापार, कृषि, पशुपालन आदि में रूचि रखने के कारण वैश्य कहलाता था | यह जरूरी सामान को बाहर से खरीदकर, अपने यहां बेचता था |
- और चौथा लड़का जिसने सभी मनुष्यों की सेवा को अपना धर्म समझा वह सूद्र कहलाया | इसमें धोबी, लोहार, मोची आदि सभी वर्ग आ जाते हैं |
प्राचीन काल की स्थिति :-
. प्राचीन काल में ब्राह्मण की स्थिति सबसे बेहतर और सूद्र की स्थिति सबसे बदतर थी | ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य पूजा-पाठ, यज्ञ और वेद का पाठ कर सकते थे लेकिन सूद्र के लिए वर्जित था | सूद्र का काम इन तीनो वर्णों की सेवा करना था |
. जैसे-जैसे समय बीतता गया वैसे-वैसे कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था जन्म आधारित हो गया |
जब तक कार्य के आधार पर वर्ण व्यवस्था थी तब तक समाज उन्नति की ओर लगातार बढ़ता ही रहा, मगर धीरे-धीरे यही वर्णव्यवस्था जब से कर्म पर आधारित न होकर जन्म पर आधारित हो गई तभी से देश में जातीयता की भावना ने भी जन्म ले लिया | आधुनिक काल में मनुष्य की सामाजिक पहचान उसके जन्म से ही बनने लगी न कि कर्म से |
. अब वर्ण का निर्धारण इस आधार पर होने लगा कि वह व्यक्ति किसके घर में पैदा हुआ है | अर्थात ब्राह्मण के घर में पैदा होने वाला बच्चा जन्म से ही ब्राह्मण होने लगा और सूद्र के घर पैदा होने वाला बच्चा जन्म से ही सूद्र होने लगा |
. इस प्रकार हम कह सकते हैं कि वर्ण व्यवस्था बनाने का उद्देश्य प्राचीन काल में सामाजिक पहचान का निर्माण करना था किन्तु कालान्तर में यह जन्म आधारित हो गया | ब्राह्मण सदा ही पूज्यनीय रहा | शिक्षा तथा सभी धार्मिक कर्म करवाना ब्राह्मण के अधीन था | क्षत्रिय भी समाज में हमेशा अपने बाहुबल से समाज में श्रेष्ठ बने रहे | लेकिन इनका मुख्य कर्म समाज की ब्राह्य आक्रमण से रक्षा करना था | वैश्य की स्थिति तीसरे नम्बर पर सदैव रही| ये ब्राह्मण और क्षत्रिय से नीचे की श्रेणी में आते हैं | इनका मुख्य काम व्यापार करना, पशुपालन करना आदि था | और सबसे बदतर स्थिति सूद्र की रही| जिसने प्राचीन काल में अपनी योग्यता के अनुसार अन्य तीन वर्णों की सेवा करना स्वेच्छा से स्वीकार किया था धीरे-धीरे उसकी यही नियति बन गई | शुरूआत में वर्ण व्यवस्था कर्म प्रधान होने के कारण इन्हें थोड़ा बहुत सम्मान मिलता था लेकिन जब से जन्म प्रधान हुई तब से इन्हें अन्य तीन वर्णों से हमेशा ही अपमान मिला |
आज की स्थिति :-
वर्तमान में भारतीय समाज में वर्ण व्यवस्था जन्म के आधार पर है | भले ही यह व्यवस्था जन्म आधारित हो किन्तु जब से देश आजाद हुआ है इसका स्वरूप काफी हद तक बदल गया है | आज हम जन्म से भले ही सूद्र हों लेकिन यदि हममें योग्यता है शिक्षा देने के साथ-साथ भारत के सर्वोच्च पद पर बैठ सकता हैं | उसी तरह जन्म से ब्राह्मण होने पर भी यदि योग्यता नहीं है तो हमें सूद्र का का काम भी करना पड़ सकता है | प्राचीन काल में जो भेदभाव किया जाता था उसे काफी संघर्ष के बाद अब मिटाया जा सका है |अन्त में:-
जो भी हो मेरे विचार में वर्ण व्यवस्था विकास में सदैव बाधक ही रही है | जब तक हम बंटवारे की इस व्यवस्था का अन्त नहीं कर देते तब समाज को एकता के सूत्र में नहीं बांध सकते | और न ही समुचित विकास कर सकते हैं |अगर मेरे विचार से आप सहमत हों तो लाइक कीजिए और सब्सक्राइब कीजिये | साथ ही भारतीय संस्कृति की वर्ण व्यवस्था के बारे में आपके विचार क्या हैं, कमेंट के माध्यम से हमें अवगत कराएं |
धन्यवाद |
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