विश्व का गौरव : भारतीय संस्कृति :-
भारतीय संस्कृति सर्वव्यापक और निरंतर गतिशील संस्कृति है | जो अनादि काल से निरंतर प्रवाहमान है | यह सत्यं, शिवं व सुंदरम् की अवधारणा के साथ पल्लवित व फलित होती है | भारतीय संस्कृति के गौरव देश के सामने दुनिया की हर संस्कृति ने अपने घुटने टेक दिए | इसकी विशालता इतनी है कि पूरी उम्र लगाकर भी थाह पाना मुश्किल है और सहज इतना कि अनपढ़ व्यक्ति भी इसका कायल हो जाए |
जो संस्कृति इतनी समृद्ध, व्यापक और विशाल है और जिसे सम्पूर्ण विश्व के मनीषियों ने न सिर्फ सहर्ष स्वीकारा है बल्कि मुक्त कंठ से प्रसंशा भी है उसके बारे में बेहतर और सटीक जानकारी होना आवश्यक है | यह सटीक जानकारी आपको इसी ब्लॉग पर मिलेगी |
आइये जानते हैं संस्कृति की परिभाषा और भारतीय संस्कृति का स्वरूप क्या है?
संस्कृति की परिभाषा :-
संस्कृति का अर्थ होता है परिमार्जित करना या परिष्कृत करना | मनीषी गण इसकी व्याख्या परंपरा से चली आ रही रहन-सहन , आचार-विचार, जीवन पद्धति व संस्कार के रूप में भी करते हैं | जो प्रत्येक देश की अलग-अलग होती है | किसी भी देश की संस्कृति में मुख्यतः सभी कलाओं, ज्ञान विज्ञानों, धर्म -दर्शन और विभिन्न सामाजिक प्रथाओं को ग्रहण किया जा सकता है |मनीषियों व शिक्षाविदों ने संस्कृति को निम्न प्रकार से परिभाषित करने का प्रयास किया है....
रामधारी सिंह दिनकर के शब्दों में -
संस्कृति एक ऐसा गुण है जो हमारे जीवन में छाया हुआ है | एक आत्मिक गुण है जो मनुष्य स्वभाव में उसी तरह व्याप्त है, जिस प्रकार फूलों में सुगंध और दूध में मक्खन | इसका निर्माण एक या दो दिन में नहीं होता, युग-युगान्तर में होता है |
वहीं संस्कृति के विषय में ई. बी. टायलर का मानना है कि
संस्कृति एक जटिल संपूर्ण है जिसमें समस्त ज्ञान, विश्वास, कलाएं, नीति, विधि,रीतिरिवाज तथा वे अन्य योग्यताएं समाहित हैं जिसे मनुष्य समाज का सदस्य होने के नाते अर्जित करता है|
संस्कृति का निर्माण और भारतीय संस्कृति का स्वरूप :-
मनुष्य धीरे-धीरे विकास के साथ अपने आस-पास सामाजिक वातावरण, संस्था, रीति-रिवाज, परंपरा, दर्शन, व्यवस्था, भाषा, लिपि व कलाओं का विकास करके विशिष्ट संस्कृति को निर्मित करता है | इसी प्रक्रिया से गुजरने के बाद भारतीय संस्कृति की रचना हुई |विश्व में अनेको संस्कृतियों की रचना हुई किन्तु भारतीय संस्कृति का स्थान उनमें सर्वश्रेष्ठ है |
यह संस्कृति भारत में ही नहीं अपितु संपूर्ण विश्व में फैली हुई है | तीन तरफ से समुद्र और एक तरफ से अपराजेय हिमालय के बीच में पली-बढी़ यह भारतीय संस्कृति अपने अंदर वशुधैव कुटुंबकम् की भावना को समाहित किए हुए है, जो अन्य किसी भी संस्कृति में दृष्टिगोचर नहीं होता |
भारतीय संस्कृति का स्वरूप अनेकता में एकता वादी है | यह संस्कृति तमाम धर्मो, विचारों, वर्णों तथा संस्कृतियों में बटे होने के बावजूद भी जादुई एकता का पोषक है जिसे निम्न रूपों में आसानी से समझा जा सकता है |
1- भौगोलिक एकता :-
भारतीय संस्कृति की भौगोलिक विभिन्नता में एकता है | इस देश की उत्तरी सीमा शीत कटिबंध में है तो वहीं मध्य भाग शीतोष्ण कटिबंध में है और सबसे दक्षिणी भाग उष्ण कटिबंध में है | तीन तरफ से समुद्र और एक तरफ से हिमालय इसकी अपराजेय सीमा बनाते हैं जो चारों तरफ से हमारी भौगोलिक एकता का आधार हैं |2- राजनीतिक एकता :-
प्राचीन काल में साधन के अभाव में राजनैतिक एकता स्थापित करना मुश्किल था परन्तु जैसे-जैसे साधन का विकास होता गया अथक प्रयासों के साथ हमारी राजनैतिक एकता भी स्थापित होती गयी | इसके लिए प्राचीन काल में राजसूय यज्ञ तथा अश्वमेघ यज्ञ आदि किए जाते थे | भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भारत की राजनैतिक एकता का स्वरूप काफी हद तक विकसित हो चुका था |3- सांस्कृतिक एकता :-
भारत की अखण्डता का सबसे विकसित रूप सांस्कृतिक स्वरूप में मिलता है | समय-समय पर तमाम विदेशी आक्रमणकारियों के आने से और अपनी संस्कृति का जमकर प्रचार प्रसार करने के बावजूद भी भारतीय संस्कृति तनिक भी विचलित नहीं हुई वरन् उन संस्कृतियों को खुद में समाहित करते हुए और भी व्यापक और परिष्कृत रूप में सामने आयी |इसके साथ उपजी दुनिया की अन्य संस्कृतियां अपने आप को समय प्रवाह में ढाल न सकने के कारण काल प्रवाह में विलीन हो गयीं | लेकिन भारतीय संस्कृति अपनी हस्ती को अनवरत बनाये रखा |
4- धार्मिक एकता :-
भारतीय संस्कृति धार्मिक स्तर पर सबसे ज्यादा समृद्ध है | यह संस्कृति हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इकाई, पारसी, जैन व बौद्ध आदि और भी अनेको धर्मों की विविधता के साथ चलते हुए भी अद्भुत एकता स्थापित करती है | आदि शंकराचार्य के चारों दिशाओं में स्थापित चार मठ आज चारों धाम के नाम से प्रसिद्ध हैं |5- भाषागत एकता :-
समस्त भारतीय भाषाओं का जन्म संस्कृत से होने के कारण स्वरूप में भिन्नता होने पर भी उनमें भाषागत एकता विद्यमान है | भाषायी रूप से हिन्दी, पंजाबी, बांग्ला आदि प्रदेशों में बटे होने के बाद भी हमें संस्कृत भाषा की मजबूत डोर भाषायी एकता में बांधे रहती है |इस प्रकार समग्र रूप में हम भारतीय संस्कृति के बारे में कह सकते हैं कि भारतीय संस्कृति में जाति, धर्म, भाषा, व्यवहार, वर्ण आदि के होते हुए भी मूलत: एकता को स्थापित करती है और देश को मजबूती प्रदान करती है | भारतीय संस्कृति में वे तमाम गुण हैं जो उसे दुनिया की अन्य संस्कृतियों से विशिष्ट बनाती है |
नोट :-
भारतीय संस्कृति समग्र रूप में बहुत बड़ी है जिसे एक पोस्ट के माध्यम से गहराई तक नहीं समझा जा सकता है | भारतीय संस्कृति को गहराई में समझाने के लिए मैं एक के बाद एक पोस्ट लाता रहूंगा | ताकि विश्व के सभी लोग भारतीय संस्कृति को जान व समझ पाएं तथा देश के गौरव का नाज के साथ वर्णन कर सकें |आप सभी से निवेदन है कि भारतीय संस्कृति के इस पोस्ट जितना हो सके अपने परिचितों में शेयर करें ताकि वे इस अमूल्य जानकारी का लाभ उठा सकें और आप भी लाइक तथा कमेंट कीजिए |

Comments
Post a Comment