हमारा प्रत्येक कार्य, प्रत्येक अंग संचालन और प्रत्येक विचार हमारे चित्त पर एक नया संस्कार छोड़ जाते हैं जो लगातार अभ्यास से हमारी आदत बन जाते हैं | ये दो प्रकार की होती हैं पहली अच्छी आदतें और दूसरी बुरी आदतें| हम आज इस लेख से यह जानेगें कि अपनी बुरी आदतों को अपने अवचेतन मन से बाहर निकालकर अच्छी आदतों को कैसे अपनाएं |
हमारे सम्पूर्ण व्यक्तित्व का निर्धारक हमारी आदतें होती हैं | हम किसी व्यक्ति के नजर में अच्छे हैं या बुरे यह हमारी आदतें ही तय करवाती हैं | अत: हमें अपनी आदतों का निर्माण सोच समझकर करना चाहिए | हमारी आदतें ही हमें सफल या असफल बनाती हैं क्योंकि सफल व्यक्ति उस काम को करने की आदत बना लेते हैं जिस काम को करने में असफल व्यक्ति हिम्मत हार बैठते हैं |
जब सफलता और असफलता हमारे अपने हाथ में है तब क्यूँ ना हम सभी सफल हों और सफल होने के लिए सबसे ज़रूरी चीज है कि हममें वे आदतें हों जो सफल व्यक्तियों में मूलत: पायी जाती है |
इसके लिए हमें सबसे पहले किसी शांत जगह पर बैठ जाना चाहिए और चित्त को एकाग्र करके अपने अंदर की उन आदतों की सूची बना लेनी चाहिए जिन्हें हम अपनाना चाहते हैं या फिर जिन्हें हम छोड़ना चाहते हैं | फिर उन आदतों को हमें लगातार कम से कम 21 दिन अपनाना है क्योंकि 21 दिन लगातार किसी कार्य को करते रहने से वो हमारी आदत का हिस्सा बन जाती हैं |
शुरूआत में आपको अपनी रोजमर्रा की जिंदगी को बदलने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है लेकिन यकीन मानिए जिस दिन आप बुरी आदतों को त्यागकर अच्छी आदतों के निर्माणकर्ता बन जाएंगे उस दिन आपको सफल होने से कोई नहीं रोक सकता | आदतें हममें उस प्रेरणादायी लेक्चर की तरह होती हैं जो हमेशा हमें आगे बढ़ते रहने के लिए प्रेरित करती रहती हैं |
मैं अपने जीवन का एक वाक्या बताना चाहता हूँ जिसने मुझे अपने गांव से एक पीढ़ी आगे पहुंचा दिया |उस समय मैं 8-9 बरस का था और दो बहनो के बीच अकेला भाई होने के नाते मैं मारे दुलार का अंधा था | दिन भर घूमते रहने और गलत संगत की वजह से गाली वगैरह सीखने लग गया था | यही रोज का सिलसिला बन गया |
धीरे-धीरे ये चीजें मेरी आदत में शुमार होती चली गयी | आदतन एक दिन मैने अपने ओसारे से ही एक पडोसी लड़के को गाली दिया | उसने जवाब देना शुरू ही किया था कि एक झन्नाटेदार तमाचा मेरे गाल पर आकर पड़ा और मैं रोने लगा| वह हाथ मम्मी का था | फिर उन्होने मुझे समझाया कि गाली नहीं देना चाहिए | उसके बाद मैने आज तक कभी गाली नहीं दिया | उसका सकारात्मक फल भी मुझे मिला है | इस एक आदत को बदलने की वजह से मेरी गलत संगत छूट गई और मैं अच्छी संगत में पलते -बढ़ते आज उनसे काफी आगे निकल आया हूँ |
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि हम अपने नजरिये को बदलकर अपना व्यवहार बदल सकते हैं | यही व्यवहार ही हमारी आदत होती हैं जिसे बदलना सबसे आसान कार्य है बशर्ते हम उसके लिए शारीरिक व मानसिक रूप से तैयार हों | हममें निष्ठा व विश्वास हो कि हम करने में समक्ष हैं |
यह लेख मैने जितना रिसर्च के आधार पर लिखा है उससे कहीं ज्यादा अपने वैयक्तिक अनुभवों के आधार पर लिखा है | जो भी चीजें मैनें यहां पर बता़यी है उसका प्रयोग सबसे पहले मैने खुद पर किया है क्योंकि किसी भी व्यक्ति को अपने उन्हीं विचारों को सबसे बांटने का अधिकार है जिसे वह खुद जी रहा हो | यहां पर मैं ढृढ़ता से कह सकता हूँ कि सफल होना उतना ही आसान है जितना कि आदतों का निर्माण करना |
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