भारतीय संस्कृति की विशेषताएं :-
भारतीय संस्कृति दुनिया की सबसे अनुपम व अद्वितीय संस्कृति है जिसकी बराबरी दुनिया की कोई भी संस्कृति नहीं कर सकती है | भारतीय संस्कृति अपने आप में अनूठे विशेषताओं का संगम है जो उसे अन्य संस्कृतियों से अलग बनाती है |
हममें से बहुत से लोग हैं जो भारतीय संस्कृति के बारे में जानना तो चाहते लेकिन इंटरनेट पर आसान भाषा में भारतीय संस्कृति के बारे में मिलना मुश्किल है इसीलिए भारतीय संस्कृति को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से आसान भाषा में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहा हूँ | मुझे विश्वास
है आप सभी इसे पसंद करेंगे |
1~ सबसे पुरानी :-
भारतीय संस्कृति दुनिया की सबसे पुरानी संस्कृति है | मिश्र की संस्कृति संभवत: इसके आसपास की है पर आज मिश्र की संस्कृति सिर्फ नाममात्र की रह गयी है | इसके बाद बहुत सी संस्कृतियों ने जन्म लिया लेकिन वे समय के साथ कदम-ताल न कर पाने के कारण समाप्त हो गयीं | आज के समय में भारतीय संस्कृति की तुलना सिर्फ और सिर्फ चीन से की जा सकती है और किसी से नहीं |
2~ अनवरत प्रवाहमान :-
भारतीय संस्कृति अनादि काल से समय के साथ अनुकूलन करते हुए लगातार प्रवाहमान है | भारतीय संस्कृति को नष्ट करने के लिए अनेको बाधाएँ आयीं लेकिन इसे नष्ट करने के बजाय वह खुद इसी संस्कृति में घुल-मिल गईं |
3~ सहिष्णुता का सजीव रूप :-
भारतीय संस्कृति जितनी प्राचीन है उससे भी कहीं ज्यादा सहनशील है | बाकी अन्य संस्कृतियों में सहनशीलता का गुण देखने को नहीं मिलता है | भारतीय संस्कृति ने प्रत्येक धर्म तथा मनुष्य की आस्था को पूर्ण स्वतंत्रता दी | यही कारण है कि भगवान की संख्या इस देश में अनंत है| यह हर धर्म, व्यक्ति के भावों एंव विरोधों को सहन करते हुए उनमें समन्वय की भावना जगाती है | भारतीय संस्कृति पृथ्वी के समान ही सहनशील है |
4~ ग्रहणशीलता :-
भारतीय संस्कृति अपने संपर्क में आने वाली सभी संस्कृतियों की अच्छी बातों को ग्रहण करने के प्रति अत्यंत लचीली है |यह यूनानी, ब्रिटिश, मुगल, शक, हूण आदि अनेक संस्कृतियों से अच्छी चीजें सीखते हुए आगे बढ़ रही है और अपना विकास कर रही है | भारतीय संस्कृति के बारे में कहा जा सकता है कि यह उस समुद्र के समान है जिसमें आकर सभी नदियां मिल जाती हैं |
5~ आध्यात्मिकता का अंश :-
आध्यात्मिक भावना इस संस्कृति की सबसे खास विशेषता है | भारतीय संस्कृति प्रारम्भ से ही आध्यात्मिकता का पुरजोर समर्थन करती है | धर्म ,अर्थ , काम, मोक्ष आदि चारों चीजों में से अध्यात्म में धर्म और मोक्ष दोनो बराबर का महत्व रखते हैं | भारतीय संस्कृति मोक्ष को मनुष्य जीवन का अंतिम लक्ष्य मानता है और इस अंतिम लक्ष्य को प्राप्त करने में अध्यात्म ही सबसे सहायक मार्ग है |
6~ सर्वांगीर्णता :-
भारतीय संस्कृति मनुष्य का सर्वांंगीण विकास करती है | इसके लिए भारतीय संस्कृति ने ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास नामक चार आश्रमों की रचना है | ये चार आश्रम मनुष्य के जन्म से लेकर जीवनपर्यन्त स्तर-ब-स्तर जीवन के प्रत्येक पक्ष का विकास करती हैं |
7~ अनेकता में एकता :-
भारतीय संस्कृति अनेकता में एकता का अद्भुत संयोजन करती है | भारत के हर राज्य अपनी अलग -अलग पहचान रखते हैं यही पहचान हमारी संस्कृति है | जैसे उत्तर प्रदेश की महिला अलग ढंग से साड़ी बांधती है और मराठी महिला अलग ढंग से | साड़ी बांधने का यह अलग -अलग ढ़ग वहां की संस्कृति को दर्शाता है | भारत में हर राज्य की अलग-अलग संस्कृति होने के बावजूद उनमें एकता का अद्भुत समन्वय है |
8- धार्मिकता :-
भारतीय संस्कृति अनेक धर्मों के बीच एकता स्थापित करती है | भारतीय संस्कृति धर्म के बल पर ही टिकी हुई है | धर्म वह होता है जो इहलोक व परलोक दोनों को सिद्ध कर दे | अर्थात पृथ्वी पर मनुष्य जीवन को सुखमय बनाने के साथ - साथ जो तत्व उसके मोक्ष प्राप्ति में सहायक हो धर्म कहलाता है |
भारत में हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई आदि सभी धर्म इन दोनों तत्वों की पूर्ति में सहायक हैं |
आशावाद :-
आशावाद भारतीय संस्कृति की अप्रतिम विशेषता है | जीवन में चाहें कितनी भी विपत्ति आये, कितने भी दुख मिले तब इन चीजों से लड़कर आगे बढ़ते हुए अपने लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है | भारतीय संस्कृति में निराशा नाम की कोई चीज है ही नहीं | यह आशा को प्रकाश मानती है और निराशा को अंधकार |
10~ कर्मवाद :-
कर्मवाद भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है | भारतीय संस्कृति में प्रत्येक मनुष्य कर्म करते हुए सौ वर्ष जीने की कामना करता है जबकि अन्य संस्कृति में ऐसा नहीं है | श्रीकृष्ण ने कुरूक्षेत्र में अर्जुन को गीता का ज्ञान देते समय इसी कर्मवाद की पुन: स्थापना की | कर्म करते हुए मनुष्य को कर्मफल की इच्छा नहीं होनी चाहिए क्योंकि सिर्फ कर्म करना उसके हाथ में है फल की प्राप्ति नहीं और दूसरी चीज फल की इच्छा से किया गया कर्म मनुष्य को आसक्ति के बंधन में बांधना है और मनुष्य मोक्ष की प्राप्ति नहीं कर पाता जो कि भारतीय संस्कृति का प्राणतत्व है |
11~ पुनर्जन्म व अवतारवाद :-
भारतीय संस्कृति का मानना है कि आत्मा अजर -अमर है | जब तक आत्मा मोक्ष प्राप्त कर जन्म - मरण के चक्र से मुक्ति नहीं प्राप्त कर लेता तब तक वह अपने कर्मों के अनुसार जन्म पाता रहता है | जन्म का यही चक्र पुनर्जन्म की अवधारणा है |
साथ ही भारतीय संस्कृति यह भी मानती है कि जब -जब संसार में पापकर्म बढ़ने लगते हैं और पुण्य कर्म कम होने लगते हैं और चारो तरफ जनता त्राहि- त्राहि कर रही होती है उस समय ईश्वर अपने भक्तों की रक्षा के अलग-अलग रूपों में प्रकट होते हैं | बार - बार पृथ्वी पर ईश्वर का अलग-अलग रूपों में प्रकट होना ही अवतार वाद है |
प्राणियों की रक्षा के विष्णु के अनेक अवतार माने जाते हैं | जैसे - हिरणाकश्यप के अत्याचार से मुक्ति दिलाने के लिए नृसिंह अवतार और रावण से मुक्ति के लिए रामावतार | श्रीकृष्ण, कूर्म, वाराह अवतार आदि अवतारवाद की अवधारणा को पुष्ट करते हैं |
12-त्यागभाव :-
त्यागभाव भारतीय संस्कृति की अन्यतम विशेषता है | दूसरे के हित की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व त्याग देने की भावना सिर्फ और सिर्फ भारतीय संस्कृति में ही पायी जाती है | शिवि, कर्ण, जटायु, आदि अपनी त्याग भावना के कारण ही अमर हैं |
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि भारतीय संस्कृति मनुष्य का सर्वागीण विकास करती है | यह इहलोक के साथ परलोक को भी सुधारती है | इस संस्कृति में जीवन के वे सभी मूल्य समाहित हैं जिससे मनुष्य अपने व्यक्तित्व को उत्कृष्ट करने के साथ -साथ मोक्ष का अधिकारी बन सके | भारतीय संस्कृति जितनी प्राचीन है उससे भी कहीं ज्यादा मूल्यसम्पन्न |
नोट :-
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