Skip to main content

जीवन में नवाचार


आज इस लेख के माध्यम से जानने व समझने की कोशिश करेंगे कि कैसे हम अपने जीवन में नवाचार को अपनाकर उसे सरल और सहज बना सकते हैं...


जब बच्चा पैदा होता है तब वह सारी दुनिया से अनजान सिर्फ अपना शरीर व सांसे लेकर धरती पर आता है | लेकिन जैसे-जैसे वह बडा़ होता जाता है वैसे-वैसे अपने व्यक्तित्व को निखारता जाता है |इस निखारने के क्रम में वह अधिकांशतः नकल का सहारा लेता है जो सदियों से बाप-दादाओं की पीढी़-दर-पीढी़ चलने वाली परंपरा और समसामयिक वातावरण का मिला-जुला रूप होता है |


ऐसे में वह ऊहापोह की स्थिति में रहता है और उस द्वन्द से निकलने का भरसक प्रयास करता है |
एक तरफ उसकी संस्कृति आड़े आती है तो दूसरी तरफ समसामयिकता का द्वन्द |  ऐसे में वह अपने संघर्ष और सूझबूझ के द्वारा जो भी निर्णय लेता है जिसमें परंपरा को भी कोई हानि न हो और वह वर्तमान संदर्भ में भी फिट बैठती हो,
को ही नवाचार की संज्ञा दी जाती है |

इसे एक उदाहरण के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं..
   


अभी हाल ही में यूपी के एक माध्यमिक विद्यालय में प्रशिक्षु शिक्षक के रूप में सेवा देने के लिए गया | वहां पर मैने देखा सभी शिक्षक ईमानदारी के साथ शिक्षण कार्य में जुटे हैं और बच्चे भी | लेकिन बच्चे
हर दिन बोर हो जाते थे क्योंकि सिर्फ किताबी ज्ञान ही उनको परोसा जा रहा था वह भी उबाऊ तरीके से |
एक-दो दिन मैने वहां की स्थिति का जायजा लिया और फिर बच्चों को इस उबाऊ रीति से  छुटकारा देने का निश्चय किया | शुरू में मुझे भी समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे करूं लेकिन कहते हैं ना कि जहां चाह है वहीं राह है | मैं कोई भी विषय पढा़ते हुए उनसे उनकी लोकल बोली में बात करने लगा और अपने आप को एक मजाकिया शिक्षक के रूप में पेश किया | इसका असर यह हुआ कि बच्चे बहुत जल्दी ही मुझसे घुल मिल गए और मुझसे अपनी हर बात बेझिझक कहने लगे|
मैं किताबी सामाग्री को व्यवहारिक जीवन से जोड़कर पढा़ता था | इससे बच्चों को चीजें बहुत जल्दी समझ में आने लगी और उनका आत्मविश्वास भी जागृत होने लगा |

इसके अलावा उन सबके साथ शाम को एक घंटा खेलता था, जो कि वहां इससे पहले कभी नहीं किया गया था | कक्षा में नाटक, प्रतियोगिता और अन्य कार्यक्रम भी आयोजित करवाया जिससे बच्चों में सामूहिक कार्य करने की प्रवृति का विकास होने लगा |

इस तरह से 15-20 दिन काम करते में ही बड़े स्तर पर सकारात्मक परिवर्तन दिखाई देने लगे.. अब खेल-खेल व हंसी- मजाक में ही वे चीजों को रोजमर्रा के जीवन से जोड़कर सीखने लगे और हम भी रोज कुछ न कुछ नया करने का प्रयास करने लगे ताकि पढ़ाई को बच्चों के लिए और भी सहज बनाया जा सके |

अब न तो बच्चों को पढाई बोझ लग रही थी और ना ही हमें पढा़ने के लिए कोई विशेष मेहनत करनी पड़ती |
इस कार्य की मैने शुरूआत भले ही मैने की थी लेकिन यह अकेले मेरे लिए बहुत मुश्किल का कार्य सिद्ध होता गर वहां के सभी शिक्षक बंधु हर कदम पर मेरे साथ न चले होते |इस महान बदलाव में उनका मारे जीवन का सबसे बड़ा नवाचार भी था |बराबर का सहयोग रहा है |यहीं से हमारे जीवन में नवाचार की शुरुआत होती है और यही ह


इस तरह से हम छोटे-छोटे सुधार करके अपने जीवन को सहज व सरल बना सकते हैं |
आशा करते हैं कि यह लेख आपके लिए उपयोगी सिद्ध होगा |




Comments

Popular posts from this blog

आत्मनिर्भर कैसे बने

आत्मनिर्भर कैसे बने :- हम सभी लोग बचपन से ही सुनते आए हैं कि आत्मनिर्भर बनो, अपने पैरों पर खड़े हो आदि | लेकिन क्या हमने कभी सोचा कि आखिर आत्मनिर्भर बला क्या है और आत्मनिर्भर कैसे बना जाता है ? नहीं ना |  चलिए आज हम आप सभी को बताते हैं कि आत्मनिर्भर होना किसे कहते हैं और आत्म निर्भर कैसे बना जाए | आत्मनिर्भर व्यक्ति में कौन कौन से गुण होते हैं.  | आत्मनिर्भर कैसे बने आत्मनिर्भर दो शब्दों से मिलकर बना है आत्म व निर्भर | आत्म का अर्थ होता है खुद या स्वयं और निर्भर का अर्थ होता है आश्रित होना | इस प्रकार आत्मनिर्भर का अर्थ हुआ खुद पर निर्भर होना | अर्थात किसी  भी काम के लिए , किसी और पर आश्रित ना होना ही आत्मनिर्भर कहलाता है |स्वावलम्बन ,आत्मनिर्भर का दूसरा नाम है | आत्म निर्भर बनने के तरीके :- आत्म निर्भर बनने के बहुत से तरीके हैं किन्तु हम यहां उन्ही तरीकों के बारे में चर्चा करेंगे जो हमारे लिए बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण हैं | ये तरीके निम्नवत् हैं - 1-सेल्फ एक्टिविटी :- कोई भी काम खुद से करना ही सेल्फ एक्टिविटी कहलाता है | किसी भी व्यक्ति के लिए सेल्फ...

आलस्य दूर करने के अचूक उपाय

आलस्य दूर करने के 10 अचूक उपाय :- किसी भी मनुष्य को सफलता के शीर्ष पर पहुंचने या मंजिल की तरफ अपने कदम बढ़ाने में सबसे बड़े बाधक के रूप में जो पहला महत्वपूर्ण तत्व सामने आता है, वह है आलस्य | यही आलस्य हर असफलता का आधार है | आलस्य का मतलब हमारे मन व शरीर पर सुस्ती का हावी हो जाना है |  सुस्ती जिस हद तक हावी होती चली जाती है आलस्य उससे भी अधिक तेजी से अपना पैर जमाता चला जाता है जो हर प्रकार के रोग का जनक होता है | आलस्य के बारे में जानने के बाद हम सभी के मन में यह सवाल उठता है कि आखिर यह आलस्य होता क्यूँ है ? आलस्य के कारण क्या हैं ? आगे इसी सवाल का जवाब आगे दिया जा रहा है.-- आलस्य के कारण :- वैसे तो हमारे भीतर आलस्य पैदा होने के अनेको कारण हो सकते हैं लेकिन यहां सिर्फ मूल भूत कारणों पर चर्चा की जाएगी  जो निम्नवत हैं - 1- हमारे शरीर को पर्याप्त मात्रा में नींद का ना मिल पाना |  2- अधिक भोजन करना भी आलस्य को जन्म देता है  3- भाग्यवादी नजरिया, आलस्य का ही रूप है | 4- व्यक्ति के जीवन में किसी लक्ष्य का न होना | 5- किसी कार्य को करने में ...

मुफ्त की आदत का हम पर प्रभाव : फायदा या नुकसान

 मुफ्त की आदत का हम पर प्रभाव  : फायदा या नुकसान कोई भी वस्तु मुफ्त में नहीं मिलती जी हां कोई भी वस्तु मुफ्त में नहीं मिलती | और अगर मिल रही है तो उसकी कीमत बड़ी महंगी होती है | कभी-कभी तो इसकी कीमत अपनी स्वतंत्रता देकर चुकानी पड़ती है | अगर आप भी किसी भी प्रकार की मुफ्त की चीजों के आदी हो गए हैं तो सावधान हो जाइए.. क्यों कि इसका प्रभाव बहुत भयानक है |  जो इंसान मुफ्त में कोई वस्तु लेता है तो वह देने वाले का एहसानमंद हो जाता है और एहसान के तले दबा व्यक्ति कभी भी निष्पक्ष व्यवहार नहीं कर सकता फिर चाहें देने वाला कितना ही अन्याय क्यों न करे | आज हम इस पोस्ट के माध्यम से यह जानेंगें कि आखिर मुफ्त में मिली वस्तु हमारे अमूल्य जीवन पर क्या प्रभाव डाल रही है और इसके फायदे तथा नुकसान क्या हैं. ? फायदा मुफ्त में मिलने वाली वस्तु को तमाम अध्ययन और इतिहास खंगालने तथा व्यवहारिक अनुभव के आधार पर फायदे और नुकसान के आधार पर देखें तो इसका फायदा बहुत कम है या फिर यूं कहें कि न के बराबर है लेकिन नुकसान बहुत है | फायदा देखने पर सिर्फ एक ही चीज समझ में आती है कि बिना मेहनत किए हमारी उस ...